Indira Ekadashi | इंदिरा एकादशी व्रत कथा व माहात्म्य#आश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी कथा

Indira Ekadashi | इंदिरा एकादशी व्रत कथा व माहात्म्य#आश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी कथा


श्री गणेशाये नमः।।
भगवान विष्णु का द्वादश अक्षर मंत्र -- जिसे जपकर भक्तराज ध्रुव ने हरि नारायण को प्रसन्न किया ----

" ॐ नमो भगवते वासुदेवाय "

जय श्री हरि !
मैं नन्द किशोर आज आपके लिए मैं पावन पवित्र आश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी कथा व माहात्म्य लेकर आया हूँ जो पुण्य प्रदायिनी इंदिरा के नाम  से प्रसिद्ध है। जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर महाराज को सुनाया है और जो ब्रह्मवैवर्त पुराण से लिया गया है।


Indira Ekadashi | इंदिरा एकादशी व्रत कथा व माहात्म्य#आश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी कथा


भगवान श्री कृष्ण ने कहा -- हे पाण्डव ! 
                  आश्विन कृष्णपक्ष में इंदिरा नाम की एकादशी होती है। इस व्रत के प्रभाव से बड़े - बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं । अधोगति को प्राप्त हुए पितरों को यह गति देने वाली है । 

हे राजन् ! सावधान होकर इस पापों को दूर करने वाली कथा को सुनो । इसके सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है ।

राजा इन्द्रसेन की कथा 
         
         पहले सत्ययुग में शत्रुओं को दबाने वाला इन्द्रसेन महाप्रतापी राजा था । वह माहिष्मतीपुरी  में धर्म से प्रजा का पालन करते हुए राज्य कर रहा था । वह पुत्र - पौत्र और अन्न धन से युक्त और भगवान का परमभक्त था । वह गोविंद का भजन करते हुए अध्यात्म अध्ययन में समय गुजारता था । 

एक दिन सभा में राजा सुख से बैठा था तभी वहाँ बुद्धिमान नारदजी आये ।  राजा ने मुनि का यथोचित सत्कार किए । तब नारदजी बोले -- हे राजेंद्र !  तुम्हारे सातों अंग कुशल तो हैं ? तुम भगवान के भक्त हो  न ?

नारद जी का वचन सुनकर राजा उनसे बोले -- हे मुनिश्रेष्ठ ! आपकी कृपा से मेरी सब जगह कुशल है । हे विप्रर्षे ! कृपा करके आप अपने आने का कारण बताइए । राजा के इस वचन को सुनकर नारदजी बोले -- 

हे राजशार्दूल ! मेरे आश्चर्य युक्त वचन को सुनिए।
हे पुरुषोत्तम ! मैं ब्रह्मलोक से यमलोक में गया। यमराज ने भक्ति से मेरा पूजन किया । सुन्दर आसन पर बैठकर धर्मात्मा , सत्यवादी यमराज की मैंने प्रशंसा की।  

बहुत पुण्य करने वाले तुम्हारे पिता व्रत में विघ्न पड़ने  के कारण यमराज की सभा में रहते हैं उनको मैंने देखा है। हे जनेश्वर ! उन्होंने तुम्हारे लिए संदेशा भेजा है उसको सुनो - माहिष्मती का राजा इन्द्रसेन मेरा पुत्र है उससे आप कहिएगा पूर्व जन्म के किसी विघ्न के कारण मैं यमराज के निकट रहता हूँ । हे पुत्र ! तुम इंदिरा एकादशी का व्रत करके उसका पुण्य  देकर मुझे स्वर्ग भेजो । 

हे पार्थिव ! तुम्हारे पिता के कहने पर मैं तुमसे कहने यहाँ आया हूँ । हे राजन् ! तुम इंदिरा का व्रत करो और उसके  पुण्य के प्रभाव से वे स्वर्ग को चले जायेंगे । 

राजा बोला -- इंदिरा एकादशी करने का विधान कृपा करके मुझसे कहिए ।

इंदिरा एकादशी व्रत करने का विधि ----

नारद जी बोले -  हे राजन् !  आश्विन कृष्णपक्ष के दशमी को श्रद्धापूर्वक चित्त से प्रातःकाल स्नान करे फिर मध्याह्न के समय नदी आदि में स्नान करे । पितरों को प्रसन्न करने के लिए श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करे । एक बार भोजन करके रात में भूमि पर शयन करे । प्रातःकाल एकादशी के दिन दातुन कुल्ला करके मुख धोवे फिर भक्ति भाव से उपवास के नियमों को ग्रहण करे और प्रतिज्ञा करे ---- 


आज मैं सब भोगों को छोड़कर भोजन नहीं करूँगा तथा कल मैं भोजन करूँगा । हे पुंडरीकाक्ष ! तुम मेरी रक्षा करना । 

इस प्रकार नियम करके मध्याह्न के समय शालिग्राम की मूर्ति  के सामने विधि पूर्वक श्राद्ध करके शुद्ध ब्राह्मणों का पूजन करके भोजन करावे , दक्षिणा दे । पितरों के श्राद्ध से बचे हुए अन्न को सूँघकर गौ को दे दे । भगवान का गंध पुष्प आदि से पूजन करे । रात्रि में भगवान के समीप जागरण करे । द्वादशी को प्रातःकाल भगवान का भक्ति से पूजन करके ब्राह्मणों को भोजन करावे । भाई  , धेवते पुत्र आदि के साथ स्वयं भी मौन होकर करे। 

हे राजन्! हे भूपते !  इस विधि से तुम सावधानी से इस व्रत को करो । ऐसा करने से तुम्हारे पिता स्वर्ग चले जायेंगे । ऐसा कहकर नारदजी अंतर्ध्यान हो गये। राजा ने विधिपूर्वक इस व्रत को किया । 

हे कौन्तेय ! राजा -- रानी ,पुत्र और नौकरों सहित इस व्रत को किया । आकाश से उस समय पुष्प वर्षा हुई और उनका पिता गरूड पर बैठकर स्वर्ग को चला गया । इन्द्रसेन भी निष्कंटक राज्य करके अंत समय में पुत्र को राजगद्दी पर बैठाकर स्वर्ग को चला गया । 

माहात्म्य

इसके पाठ करने और सुनने से मनुष्य सब पापों से छूटकर इस लोक में बहुत दिनों तक सभी सुखों को भोगकर अन्त में विष्णुलोक में निवास करता है।

------ श्री इंदिरा एकादशी व्रत कथा की जय।।

श्री पुरुषोत्तम भगवान की जय।।
जय लक्ष्मीपति ।।

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